My latest poem dedicated to father’s around the world is out on YouTube.
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वह बचपन के दिन मुझे भी जीने लेने दो
बारिश में आज मुझे भी भीग लेने दो
सोंधी सोंधी मिट्टी की सुगंध मुझे भी सूंघ लेने दो
वह कागज की नाव मुझे भी बहा लेने दो
यह वक्त फिर ना आएगा
कल तक तो यह हाथों से निकल जाएगा
तो क्यों ना जीयु में आज खुलकर
क्योंकि इसके लिए कोई निमंत्रण लेकर नहीं आएगा
खट्टा मीठा चूर्ण मुझे भी खा लेने दो
इमली के चटकारे मुझे भी चख लेने दो
5 –10 पैसों में बंधी थी जिंदगी
संतरे की गोली पर टिकी थी जिंदगी
खेलों के खेल भी निराले थे
पोसम पा या पिट्ठू के पीछे लोग मतवाले थे
पतंग व कंचों के तो हम भी दीवाने थे
वक्त के झरोखे में मुझे भी झांक लेने दो
वह तन्हाई के आलम में मुस्कुराहट मुझे भी लेने दो
वह बचपन के दिन मुझे भी जी लेने दो
वह मंदिर की घंटी अभी भी सुनाई देती है
वह केले का प्रसाद लिए आतुर हाथ
अभी अभी भी दिखाई देते हैं
गर्मी के दिनों में छत पर सोने का एहसास
अभी भी जवा होता है
रात के लूडो और कैरम का खेल तो अभी भी बयां होता है
पर कमबख्त वक्त दगा दे गया मुझको बुढ़ा बना गया
हाथों की लकीरों को शरीर की झुर्रियों में बदल गया
वह कसमसाये पल अभी भी याद आते हैं
वह बड़ी-बड़ी आंखों से डर देखकर
रोंगटे अभी भी सिहर जाते हैं
उन पलों को फिर से खिला उठने दो
वह बचपन के दिन मुझे भी जी लेने दो
वह दूरदर्शन की कहानी बिनाका माला की जबानी
अमीन साहनी की आवाज में मुझे भी खोने लेने दो
वह बचपन के दिन मुझे भी जी लेने दो

आओ सुनाऊं तुम्हे एक कहानी, टीचर की है कथा पुरानी।
आधा दूध, आधा हैं पानी, फिर भी कहे, हां में हू हिन्दुस्तानी।
दिखावे की जिंदगी जीता है ज्ञानी, फिर भी फटी बनियान की तरह हैं उसकी कहानी।
पीछे पीछे तो करता है वो भी चुगलानी, पर मैनेजमेंट के आगे बंन जाता है बिल्ली सयानी।
चलती कहां है उसकी मनमानी, पैरेंट्स के फीडबैक पर टिकी है उसकी जिंदगानी।
मध्यान्ह मे एक चाय के लिए तरसती जिभयाणी, दो बिस्किट पर टिकी लधानी।
काठियावाड़ी घोड़े से उसके जूतों की निशानी, जो बयान करती है उसके 8 से 2 की मेहनतानी।
कहते हैं वो चुगलियों की खान है, चलती फिरती गपशप की दुकान है।
अपने पर बन आए तो चलता फिरता तूफ़ान है, घर पर रहे तो कोहराम है।
आखिर वो भी इंसान है, ईर्ष्या करना उसका भी काम है।
ट्यूशन पढाना तो उसकी पहचान है, नोटों से खेलना तो उसकी भी शान हैं ।
कहते है कि हर ख्वाब पूरा कहां होता है, अध्यापक का तो नाम भी अधूरा होता है ।
ज़िंदगी घिस घिस कर एक घरौंदा बनाता है, और अपने सपनों को उसमे दफन कर जाता है।
आधी – अधूरी सी है ये कहानी, कुछ नई तो कुछ लगती है पुरानी।
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